वृन्दाटवी नहि कवीश्वरकाव्यकोटि-, सम्भाव्यमानगुणरत्नगणच्छटैका ।
एतामपाररसखानिमशेषखानि, संरुध्य मित्रमतिमध्यवसीय याहि ॥
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.35)
श्रेष्ठ कवि गण कोटि कोटि काव्य रचना के द्वारा भी श्रीवृन्दावन के गुण रत्न समूह की एकमात्र छटा का भी वर्णन नहीं कर सकते । हे मित्र ! निखिल इन्द्रियों की वृत्तियों का निरोध कर इस अपार रस खानि रूप वृन्दाटवी के लिए स्थिर मति होकर प्रस्थान कर ॥१.३५॥
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.35)
श्रेष्ठ कवि गण कोटि कोटि काव्य रचना के द्वारा भी श्रीवृन्दावन के गुण रत्न समूह की एकमात्र छटा का भी वर्णन नहीं कर सकते । हे मित्र ! निखिल इन्द्रियों की वृत्तियों का निरोध कर इस अपार रस खानि रूप वृन्दाटवी के लिए स्थिर मति होकर प्रस्थान कर ॥१.३५॥

