आचारज ललिता सखी, रसिक हमारी छाप ।
नित्य किशोर उपासना, जुगल मंत्र को जाप॥
जुगल मंत्र को जाप, वेद रसिकन की बानी ।
श्री वृन्दावन, इष्ट श्यामा महारानी॥
प्रेम देवता मिले बिना, सिधि होय न कारज ।
भगवत सब सुख दानी प्रगट भये रसिकाचारज॥
- श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.6)
भावार्थ - (अपनी रसोपासना का परिचय देते हुए भगवत रसिकजी कहते हैं-) हमारी आचार्य ललिता सखी हैं। रसिक हमारी छाप है। हमारे यहाँ नित्य किशोर (सहज जोडी) की उपासना है और हम युगल मंत्र का जाप करते हैं। रसिकों की वाणियाँ ही हमारे वेद है, नित्य वृन्दावन हमारा निजधाम है, वहाँ की महारानी है प्रेम की अधिष्ठात्री देवी श्रीकिशोरी जी और ये किशोरीजी ही हमारी इष्ट हैं। इनकी कृपा की प्राप्ति के बिना किसी रसिक का कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। भगवत रसिक जी कहते हैं कि इस सुख सर्वस्त्र नित्य विहार रस को रसिकों कि लिए प्रदान करने वाले केवल अनन्य रसिक चक्र चूड़ामणि स्वामी श्रीहरि दास जी महाराज हैं, जो इसी उद्देश्य से इस धराधाम पर अवतीर्ण हुए हैं ।६ ।
भावार्थ - (अपनी रसोपासना का परिचय देते हुए भगवत रसिकजी कहते हैं-) हमारी आचार्य ललिता सखी हैं। रसिक हमारी छाप है। हमारे यहाँ नित्य किशोर (सहज जोडी) की उपासना है और हम युगल मंत्र का जाप करते हैं। रसिकों की वाणियाँ ही हमारे वेद है, नित्य वृन्दावन हमारा निजधाम है, वहाँ की महारानी है प्रेम की अधिष्ठात्री देवी श्रीकिशोरी जी और ये किशोरीजी ही हमारी इष्ट हैं। इनकी कृपा की प्राप्ति के बिना किसी रसिक का कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। भगवत रसिक जी कहते हैं कि इस सुख सर्वस्त्र नित्य विहार रस को रसिकों कि लिए प्रदान करने वाले केवल अनन्य रसिक चक्र चूड़ामणि स्वामी श्रीहरि दास जी महाराज हैं, जो इसी उद्देश्य से इस धराधाम पर अवतीर्ण हुए हैं ।६ ।

