नन्दलाल कीरति कुंवरि - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (122)

नन्दलाल कीरति कुंवरि - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (122)

नन्दलाल कीरति कुंवरि, कहिबे कूँ यह दोय।
ज्यों तन की छाया प्रगट, तनसों बिलग न होय॥

- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (122)

श्री कृष्ण और श्री राधारानी कहने को तो दो हैं, परन्तु जैसे तन और उसकी छाया सदा साथ रहती है, वैसे ही ये दोनों आधे क्षण के लिए भी अलग नहीं हो सकते।