रजदान लीला

रजदान लीला

जब भी सखियाँ ब्रज में दुध दही बेचने के लिए जातीं हैं तब ठाकुरजी सखियों का रास्ता रोक कर उनसे दान मांगते हैं । एक दिन सखियों ने विचार कर निश्चय किया की आज हम ठाकुरजी से दान मांगेंगे l तो उन्होंने एक लीला निर्धारण की । गहवर वन में किशोरी जी ठाकुरजी का वेश धारण करती हैं और ठाकुरजी एक सखी (गुजरी) बन कर आते है गहवर वन में दही बेचने, फिर किशोरी जी (जो ठाकुर वेश में हैं आज) ठाकुरजी से (जो आज सखी बनकर दही बेच रहे हैं) दान माँगतीं हैं और दोनों में बहुत बहस एवं कलह की बात होती है।