न चानयत्र क्षेत्रे हरितनु - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी - स्व: नियम दशकम (02)

न चानयत्र क्षेत्रे हरितनु - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी - स्व: नियम दशकम (02)

न चानयत्र क्षेत्रे हरितनु-सनाथे 'पि सुजनाद् रसास्वादम्- प्रेम्णा दधद् अपि वसामि क्षणं अपि
समं त्व एतद् ग्राम्यावलीभी तन्वन्न अपि कथां विधास्ये संवासं व्रजभूवन प्रतिभवम्

श्री रघुनाथ दास गोस्वामी - स्व: नियम दशकम (02)

मैं एक क्षण के लिए भी किसी अन्य पवित्र धाम में नहीं रहूंगा, भले ही वह जगह में श्री कृष्ण की साक्षात अनुभूति क्यों न होती हो, भले ही वहां अत्यंत महान भक्त नित्य हरी कथा रस में क्यों न मुझे डुबाते हों अथवा उस हरी कथा रस का नित्य पान करते हों, किन्तु मेरी केवल और केवल यही इच्छा है कि मैं जन्म जन्मांतर ब्रज में ही रहूं, चाहे मैं अपना समय यहाँ के ग्रामीण लोगों से फ़ालतू बात करते हुए ही क्यों न व्यतीत करूँ।