उच्छिष्टामृत भुक्तवैव चरितं श्रृण्वंस्तवैव स्मरन्, पादाम्भोज रजस्तवैव विचरन्कुञ्जास्तवैवालयान्।
गायन्दिव्य गुणांस्त्तवैव रसदे पश्यंस्तवैवकृतिं, श्रीराधे तनुवाङ्गनोमनोभिरमलै: सोहं तवैवाश्रित:।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (240)
हे श्रीराधे! हे रसदे ! तुम्हारी ही उच्छिष्ट अमृत भोजन करने वाली मैं, तुम्हारे ही चरित्रों का श्रवण करती हुई, तुम्हारे ही कुञ्ज भवन में विचरण करती हुई, तुम्हारे ही दिव्य गुण-गणों का गान करती हुई एवं तुम्हारी चरण रज पर आश्रित तुम्हारी ही रसमयी आकृति (छवि) का दर्शन करती हुई, शुध्द काय, मन और वचन-द्वारा केवल और केवल तुम्हारी ही आश्रिता हूँ ।
गायन्दिव्य गुणांस्त्तवैव रसदे पश्यंस्तवैवकृतिं, श्रीराधे तनुवाङ्गनोमनोभिरमलै: सोहं तवैवाश्रित:।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (240)
हे श्रीराधे! हे रसदे ! तुम्हारी ही उच्छिष्ट अमृत भोजन करने वाली मैं, तुम्हारे ही चरित्रों का श्रवण करती हुई, तुम्हारे ही कुञ्ज भवन में विचरण करती हुई, तुम्हारे ही दिव्य गुण-गणों का गान करती हुई एवं तुम्हारी चरण रज पर आश्रित तुम्हारी ही रसमयी आकृति (छवि) का दर्शन करती हुई, शुध्द काय, मन और वचन-द्वारा केवल और केवल तुम्हारी ही आश्रिता हूँ ।

