इह न सुखं न सुखमरे क्वापि वृथा न पत मोहजालेऽस्मिन् - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.58)

इह न सुखं न सुखमरे क्वापि वृथा न पत मोहजालेऽस्मिन् - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.58)

इह न सुखं न सुखमरे क्वापि वृथा न पत मोहजालेऽस्मिन् ।
अनुदिनं परमानन्दवृन्दावनं हि समाश्रयाद्यैव ॥

- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.58)

इस संसार में सुख नहीं है । अरे ! कहीं भी सुख नहीं है ! वृथा इस मोह जाल में मत फंस । अनुदिन नित्य परमानन्दमय श्रीवृन्दावन का सम्यक् प्रकार से आश्रय ग्रहण कर ॥३.५८॥