न वेदाज्ञाभङ्गे कुरु भयमयेनापि वचनं - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.52)

न वेदाज्ञाभङ्गे कुरु भयमयेनापि वचनं - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.52)

न वेदाज्ञाभङ्गे कुरु भयमयेनापि वचनं, गुरूणां मन्येथाः प्रविश नहि लोकव्यवहृतौ ।
कुटुम्बाद्ये दीने द्रव न कृपया नो भव सितोऽ, सकृत् स्नेहैर्वृन्दावनमनु हठान् निःसर सखे ॥

- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.52)

हे सखे ! वेदों की आज्ञा को भङ्ग करने में भय मत कर। मातापितादि गुरुजनों के वचनों को मत मान, लोकव्यवहार वा लोकापेक्षा में प्रवेश न कर, दीन चित्त कुटुंबियों के प्रति करुणा से द्रवित न हो, स्नेह में आकर वार वार संसार में आबद्ध न हो, श्रीवृन्दावन के लिये शीघ्र ही धावित हो।