न कुरु न कुरु मिथ्या देहगेहाद्यपेक्षां - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.70)

न कुरु न कुरु मिथ्या देहगेहाद्यपेक्षां - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.70)

न कुरु न कुरु मिथ्या देहगेहाद्यपेक्षां
मृतिमखिलपुमर्थभ्रंशिकां विद्धि मूर्ध्नि ।
चल चल सुहृदद्यैवाभिमुख्येन वज्रा-
दपि च हृदि कठोरः श्रीलवृन्दावनस्य ॥

- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.70)

मिथ्या देह गेहादि की कभी अपेक्षा न कर, समस्त पुरुषार्थों को नाश करने वाली मृत्यु को सिर पर खड़ा जान, हे बंधो ! आज ही श्रीवृन्दावन के लिए वज्र से भी कठोर चित्त हो कर चल दे, चल दे ।