आदि अन्त जाकौ नहीं, नित्त सुखद बन आहि।
माया त्रिगुन प्रपंच की, पवन न परसत ताहि॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (25)
सदा सुख-वर्षण करने वाला यह अनादि-अनन्त श्री वृन्दावन धाम त्रिगुणात्मक प्रपंच—माया—के स्पर्श से भी सर्वथा परे है।
माया त्रिगुन प्रपंच की, पवन न परसत ताहि॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (25)
सदा सुख-वर्षण करने वाला यह अनादि-अनन्त श्री वृन्दावन धाम त्रिगुणात्मक प्रपंच—माया—के स्पर्श से भी सर्वथा परे है।

