वेणुं यत्र क्वणयति मुदा नीपमूलावलम्बी - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.27)

वेणुं यत्र क्वणयति मुदा नीपमूलावलम्बी - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.27)

वेणुं यत्र क्वणयति मुदा नीपमूलावलम्बी
संवीत श्रीकनकवसनः शीतकालिन्दीतीरे ।
पश्यन् राधावदनकमलं कोऽपि दिव्यः किशोरः
श्यामः कामप्रकृतिरिह मे प्रेम वृन्दावनेऽस्तु ॥

- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.27)

शीतल श्रीयमुना के तीर पर कदंब वृक्ष के मूल का अवलम्बन लिये हुए सुन्दर पीताम्बरधारी श्यामवर्ण कामप्रकृतिविशिष्ट कोई एक दिव्य किशोर श्रीराधा मुखकमल दर्शन करते करते जहां आनन्दपूर्वक वेणु बजाता है, उसी श्रीवृन्दावन में मेरी प्रीति हो ॥१.२७॥