किं नो भूपैः किं नु देवादिभिर्वा - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.25)

किं नो भूपैः किं नु देवादिभिर्वा - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.25)

किं नो भूपैः किं नु देवादिभिर्वा स्वाप्नैश्वर्योत्फुल्लितैः किं च मुक्तः ।
शून्यालम्बैर्वैष्णवैर्वापि किं नः श्रीमद्वृन्दाकाननैकान्तभाजाम् ॥

- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.25)

एकान्तभाव से श्रीवृन्दावनाश्रयी हमारा राजाओं से क्या प्रयोजन ? देवताओं से क्या गरज? और स्वाप्न ऐश्वर्य तुल्य ऐश्वर्य के द्वारा उत्फुल्लित मुक्तगणों से हमारा क्या प्रयोजन ? अन्य शून्यावलम्बी [परव्योम वैकुण्ठादि की प्राप्ति ही जिनका लक्ष है] वैष्णवों से भी हमारा क्या काम ?