बनी वृषभानु नंदिनी आजु - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (48)

बनी वृषभानु नंदिनी आजु - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (48)

(राग सारंग)
बनी वृषभानु नंदिनी आजु।
भूषन वसन विविध पहिरे तन पिय मोंहन हित साजु।। [1]
हाव भाव लावन्य भृकुटि लट हरति जुवति जन पाजु।।
ताल भेद औघर सुर सूचत नूपुर किंकिनि बाजु।। [2]
नव निकुंज अभिराम स्याम सँग नीकौ बन्यौ समाजु।
(जै श्री ) हित हरिवंश विलास रास जुत जोरि अविचल राजु ।। [3]

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (48)

भावार्थ -आज श्रीवृषभानु नन्दिनी कैसी सुंदर बनी हैं। उन्होंने अपने प्रियतम मोहन के लिये विविध भूषण वस्त्र सज्जित करके आपने श्रीवपु में धारण कर रखे हैं। [1]

वे (रास में) हाव भाव, लावण्य एवं भृकुटियों के नर्त्तन से युवति जनों के (सौन्दर्य्य) अभिमान को हरण कर रही हैं। (नृत्य में) ताल, भेद एवं अवघर स्वर की सूचना वे केवल अपने नूपुर किंकरिगणियों की झनकार (शब्द) मात्र से कर रही हैं। [2]

श्री हित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु) कहते हैं आज अभिराम नव निकुंज में श्याम सुन्दर के साथ (आपका) बड़ा ही सुन्दर समाज (सामञ्जस्य) बना है। इस प्रकार यह जोड़ी (सर्वदा) रास एवं विलास से युत्तक रह कर अविचल रूप से विराज रही हैं - शोभित हैं।   [3]