(राग विभास)
कबहूँ-कबहूँ मन इत-उत जात, यातैंब कौन अधिक सुख। [1]
बहुत भाँतिन घत आनि राख्यौ, नाहिं तौ पावतौ दुख॥ [2]
कोटि काम लावन्य बिहारी, ताके मुहांचुहीं सब सुख लियैं रहत रुख। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा-कुंजबिहारी कौ दिन देखत रहौं विचित्र मुख॥ [4]
-ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (03)
निज आश्रित जन से स्वामी श्री हरिदास जी कहते हैं, “हे भाई! कभी तुम्हारा मन मायिक सुखों में डूब जाता है, तो कभी परमार्थ के सुखों में। तुम्हें यह विचार करना चाहिए कि सर्वोपरि नित्य विहार रस से बढ़कर और कौन सा सुख हो सकता है?” [1]
इस बात को समझाने के लिए वे कहते हैं, “हमने अपने चित्त को अनेक प्रकार के प्रलोभनों से बचाकर, इसे महा मधुर रस में डुबाए रखा है, अन्यथा यह मन बहुत दुख पाता।” [2]
कोटि-कोटि कामदेवों से भी अधिक जिनका रूप लावण्य है, उन श्री बिहारी-बिहारिनी का श्रीमुख ही समस्त सुखों का स्रोत है। [3]
स्वामी श्री हरिदास जी कहते हैं, “अब हम सदा उस अति विचित्र श्रीमुख को ही सतत निहारते रहते हैं।” [4]
कबहूँ-कबहूँ मन इत-उत जात, यातैंब कौन अधिक सुख। [1]
बहुत भाँतिन घत आनि राख्यौ, नाहिं तौ पावतौ दुख॥ [2]
कोटि काम लावन्य बिहारी, ताके मुहांचुहीं सब सुख लियैं रहत रुख। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा-कुंजबिहारी कौ दिन देखत रहौं विचित्र मुख॥ [4]
-ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (03)
निज आश्रित जन से स्वामी श्री हरिदास जी कहते हैं, “हे भाई! कभी तुम्हारा मन मायिक सुखों में डूब जाता है, तो कभी परमार्थ के सुखों में। तुम्हें यह विचार करना चाहिए कि सर्वोपरि नित्य विहार रस से बढ़कर और कौन सा सुख हो सकता है?” [1]
इस बात को समझाने के लिए वे कहते हैं, “हमने अपने चित्त को अनेक प्रकार के प्रलोभनों से बचाकर, इसे महा मधुर रस में डुबाए रखा है, अन्यथा यह मन बहुत दुख पाता।” [2]
कोटि-कोटि कामदेवों से भी अधिक जिनका रूप लावण्य है, उन श्री बिहारी-बिहारिनी का श्रीमुख ही समस्त सुखों का स्रोत है। [3]
स्वामी श्री हरिदास जी कहते हैं, “अब हम सदा उस अति विचित्र श्रीमुख को ही सतत निहारते रहते हैं।” [4]

