राधानागरकेलिसागरनिमग्नालीदृशां यत् सुखं - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.54)

राधानागरकेलिसागरनिमग्नालीदृशां यत् सुखं - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.54)

राधानागरकेलिसागरनिमग्नालीदृशां यत् सुखं
नो तल्लेशलवायते भगवतः सर्वोऽपि सौख्योत्सवः ।
तत्राश्य कस्यचिन् निरुपमां प्राप्तस्य भाग्यश्रियं
तद्वृन्दावननाम्नि धाम्नि परमे स्वीयं वपुर्नश्यतु ॥

- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.54)

श्रीराधानागर के केलिसमुद्र में निमग्न सखियों के नेत्रों को जो सुख होता है, श्रीभगवान् के सकल सुखोत्सव भी उस सुख के लवलेश तुल्य नहीं हैं । अनुपम सौभाग्य लक्ष्मीवान जिस किसी व्यक्ति की यदि उस सुख को प्राप्त करने की आशा हो, तो श्रीवृन्दावन नामक परमधाम में अपने शरीर का पात करे, देहान्त करे ॥१.५४॥