जै श्रीवृन्दावन घन नव निकुंज - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की बानी, सिद्धान्त के पद (152)

जै श्रीवृन्दावन घन नव निकुंज - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की बानी, सिद्धान्त के पद (152)

जै श्रीवृन्दावन घन नव निकुंज में संतत बिराजत जोरी।
अति अगाध महिमा रस जिनकौ सो पैयत इक कृपा किसोरी।।
सुक नारद से भक्त मुक्त सनकादिक सुहृदनि हूँ तें चोरी।
श्रीबिहारीदास जस कहैं कहाँ लौं रसना सहस तऊ मति थोरी।

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की बानी, सिद्धान्त के पद (152)

श्री वृन्दावन के नित्य नव निकुंज में सहज ही युगल सरकार बिराजते हैं और अत्यंत रहस्मय रस बरसाते हैं। यह रस अगाध है और इसकी महिमा का वर्णन करना असंभव है, इस रस को केवल एक मात्र निकुंजेश्वरी किशोरी श्री राधा रानी की कृपा से ही पिया जा सकता है।  यह रस अत्यंत दुर्लभ है जो शुकदेव, नारद, भक्त, मुक्त एवं सुह्रद इत्यादि से भी छिपा हुआ है। श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि इस वृंदावन के विलक्षण रस को वर्णन करने में उनकी रसना एवं बुद्धि असमर्थ है।