निज प्राणेश्वरर्य्या यद्पि दयनीयेयमिति मां
मुहुश्चुम्बत्यालिङ्गति सुरत मद माध्व्या मदयति ।
विचित्रां स्नेहद्धि रचयति तथाप्यदभुत गते -
स्तवैव श्रीराधे पद रस विलासे मम मनः ॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (55)
मेरी प्राणेश्वरी की यह दया पात्र है, ऐसी जानकर अद्भुत गति शोल प्रियतम मेरा बार-बार चुम्बन करते हैं, और सुरत-मदिरा से मुझे उन्मद बना देते हैं । यदपि वे इस प्रकार विचित्र स्नेह-वैभव की रचना करते हैं; तथापि हे श्री राधे ! मेरा मन तो आपके ही श्रीचरणों के रस-विलास में रहता है ।
मुहुश्चुम्बत्यालिङ्गति सुरत मद माध्व्या मदयति ।
विचित्रां स्नेहद्धि रचयति तथाप्यदभुत गते -
स्तवैव श्रीराधे पद रस विलासे मम मनः ॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (55)
मेरी प्राणेश्वरी की यह दया पात्र है, ऐसी जानकर अद्भुत गति शोल प्रियतम मेरा बार-बार चुम्बन करते हैं, और सुरत-मदिरा से मुझे उन्मद बना देते हैं । यदपि वे इस प्रकार विचित्र स्नेह-वैभव की रचना करते हैं; तथापि हे श्री राधे ! मेरा मन तो आपके ही श्रीचरणों के रस-विलास में रहता है ।

