स्याम हौं तुम्हरे गरैं परयौ - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (02)

स्याम हौं तुम्हरे गरैं परयौ - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (02)

(राग विहागरौ)
स्याम हौं तुम्हरे गरैं परयौ ।
जो बीती तुम्ही सौं बीती मन मानैं सु करौ ।।
करो अनीति कुछ मिति नाहीं, नख सिख दोष भरौ ।
मो तन चितै आप तन चितवो अपने विरद ढरौ ।।
कीजै लाज सरन आए की जिन जिय दोष धरौ ।
अपनी जांघ उघारैं सुख सागर तुम्हीं लाज मरौ ।।
बिनती करौं काहि हौं मिलि कैं सब कोऊ कहत बुरौ ।
रसिकदास की आस करुणानिधि, तुम्हीं ढरो सो ढरो।।

- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (02)

हे श्री बांके बिहारी जी महाराज मैं आपके गले अर्थात् आपकी शरण में ही आ गया हूँ, मैं तो समस्त साधन और साध्य को त्याग कर, केवल आपकी ही शरण में आया हूँ,और मेरा जीवन आप से ही हैं, अब आपके मन में जैसा आये वैसा करो। मैंने नख से सिख तक दोषों से ही भरा होने के कारण इतनी अनीति की है जिसकी कोई सीमा नहीं है। हे प्रभु मैं समस्त रीति भाँती से आपकी शरण आया पड़ा हूँ, जिसकी लज्जा आपके हाथ है, मेरे दोषों की ओर मत देखो क्यूंकि जैसे अपनी जांघ उघारने से स्वयं को ही लज्जा आती है, ऐसे ही आपकी अपनी शरण आने वाले को त्यागने से आप को ही लजाना पड़ेगा। मैं तो इतना अधिक अधम एवं नीच हूँ जो कि समस्त संसार मुझे बुरा ही बुरा बोलता है, कोई भी ऐसा नहीं है जिससे मिल के मैं आपसे प्रार्थना कर सकूँ । 
श्री रसिक देव जी कहते हैं की हे बिहारीजी आप अगाध करुणा के सागर हैं, मेरी केवल आप ही एक मात्र आशा हो, अब केवल आप ही करोगे जो करोगे, मैं कोई योग्य नहीं हूँ ।