राधाकेलिमृगस्य कस्यचिदहो श्यामस्य यूनौ नव
स्याभीरीगणकाङ्क्षमानकरुणादृष्टेः स्मरोन्मादिनी ।
सर्वाम्नायदुरूहकृष्णरससर्वस्वैकसंचारिणी
श्रीवृन्दाविपिनाभिधा विजयते कन्दर्पकेलिस्थली ॥
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.55)
अभीरी गोपीगण जिसकी करुणापूर्ण दृष्टि की प्रार्थना करती हैं, उसी श्रीराधाकेलिमृग किसी एक श्यामाङ्ग नवीन युवक को कामोन्मत्तता विधान करने वाली एवं समस्त वेदों के सुगुप्त कृष्ण रस के सर्वस्व को ही सम्यक् प्रकार संचार करने वाली श्रीवृन्दाटवी नामक कामविलास
स्थली सर्वोत्कर्ष युक्त विराजमान है ॥१.५५॥
स्याभीरीगणकाङ्क्षमानकरुणादृष्टेः स्मरोन्मादिनी ।
सर्वाम्नायदुरूहकृष्णरससर्वस्वैकसंचारिणी
श्रीवृन्दाविपिनाभिधा विजयते कन्दर्पकेलिस्थली ॥
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.55)
अभीरी गोपीगण जिसकी करुणापूर्ण दृष्टि की प्रार्थना करती हैं, उसी श्रीराधाकेलिमृग किसी एक श्यामाङ्ग नवीन युवक को कामोन्मत्तता विधान करने वाली एवं समस्त वेदों के सुगुप्त कृष्ण रस के सर्वस्व को ही सम्यक् प्रकार संचार करने वाली श्रीवृन्दाटवी नामक कामविलास
स्थली सर्वोत्कर्ष युक्त विराजमान है ॥१.५५॥

