भगवत जन चकरी कियो - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (24)

भगवत जन चकरी कियो - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (24)

भगवत जन चकरी कियो, सुरति समाई डोर।
खेलत निसिदिन लाडिली, कबहु न डारत तोर॥

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (24)

भगवत्-रसिक जी कहते हैं कि श्री लाड़िलीजी अपने भक्त को चकरी—अपने कर-कौशल का खिलौना—बना लेती हैं और उसे अपने प्रेम की डोर में लपेटकर रखती हैं। वे दिन-रात उसी से क्रीड़ा करती रहती हैं और उसे कभी भी त्यागती नहीं हैं।