(राग सारंग)
आवति श्रीवृषभानु दुलारी ।
रूप रासि अति चतुर सिरोमनि अंग अंग सुकुमारी ॥ [1]
प्रथम उबटि मज्जन करि सज्जित नील बरन तन सारी ।
गुंथित अलक तिलक कृत सुंदर सैंदुर माँग सँवारी ॥ [2]
मृगज समान नैंन अंजन जुत रुचिर रेख अनुसारी ।
जटित लवंग ललित नासा पर दसनावलि कृत कारी ॥ [3]
श्रीफल उरज कॅसूभी कंचुकि कसि ऊपर हार छबि न्यारी ।
कृस कटि उदर गँभीर नाभि पुट जघन नितंबनि भारी ॥ [4]
मनौं मृनाल भूषन भूषित भुज स्याम अंस पर डारी ।
(जै श्री) हित हरिवंश जुगल करिनी गज विहरत वन पिय प्यारी ॥ [5]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चतुरासी (45)
भावार्थ- श्रीहित सखी ने कहा- हे सखियो अत्यन्त चतुर शिरोमणि, रूप की राशि (अपार रूपवती) एवं अङ्ग–अङ्ग में परम सुकुमारी श्रीवृषभानु दुलारी आ रही हैं। [1]
उन्होंने प्रथम तो उबटन पूर्वक स्नान किया है और तत्पश्चात् अपने श्रीअङ्ग पर नील वर्ण की सारी सज्जित की है। उनकी अलक-लटें गुँथी हुई हैं, ललाट पटल पर सुन्दर तिलक किया गया है और सिन्दूर से माँग भी सँवारी गयी है। [2]
श्रीराधा के मृग छौने के से सुन्दर नयन अञ्जन से युक्त कजरारे है और (उन नयनों की नोकों से आगे क्रमशः आगे बढ़ती हुई) रुचिर (कज्जल) रेखा (नेफा) अनुसारी गयी है। सखि! ललित नासिका पुट पर मणि जटित लवङ्ग (स्वर्ण पुष्प) शोभित है और दन्त पंक्ति भी (ताम्बूल, मिस्सी आदि रङ्गों से रंगी हुई गहरी ललामी से) राग रञ्जित सी दिख रही है। [3]
कँसूभी कथुकि के द्वारा कसे हुए श्रीफल जैसे उरोजों के ऊपर लहराते हुए हारों की छवि कुछ न्यारी (विलक्षण) ही है। अहा! कटि तो अत्यन्त कृश (पतली) है, उदर पर गम्भीर नाभि कुण्ड है और जघन तथा नितम्ब पुष्ट हैं-विशाल हैं । [4]
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं “वृषभानु दुलारी विविध भूषणों से भूषित अपनी कमल नाल सी कमनीय वाहु लता को श्रीश्याम सुन्दर के कन्धे (अंस) पर डाल कर ऐसे विहार कर रही हैं जैसे कोई गज गजी-करि करिणी युगल । हे सखि ! इस प्रकार श्रीवन वृन्दावन में पिय प्यारी (सदा) विहार ही करते रहते हैं।” [5]
आवति श्रीवृषभानु दुलारी ।
रूप रासि अति चतुर सिरोमनि अंग अंग सुकुमारी ॥ [1]
प्रथम उबटि मज्जन करि सज्जित नील बरन तन सारी ।
गुंथित अलक तिलक कृत सुंदर सैंदुर माँग सँवारी ॥ [2]
मृगज समान नैंन अंजन जुत रुचिर रेख अनुसारी ।
जटित लवंग ललित नासा पर दसनावलि कृत कारी ॥ [3]
श्रीफल उरज कॅसूभी कंचुकि कसि ऊपर हार छबि न्यारी ।
कृस कटि उदर गँभीर नाभि पुट जघन नितंबनि भारी ॥ [4]
मनौं मृनाल भूषन भूषित भुज स्याम अंस पर डारी ।
(जै श्री) हित हरिवंश जुगल करिनी गज विहरत वन पिय प्यारी ॥ [5]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चतुरासी (45)
भावार्थ- श्रीहित सखी ने कहा- हे सखियो अत्यन्त चतुर शिरोमणि, रूप की राशि (अपार रूपवती) एवं अङ्ग–अङ्ग में परम सुकुमारी श्रीवृषभानु दुलारी आ रही हैं। [1]
उन्होंने प्रथम तो उबटन पूर्वक स्नान किया है और तत्पश्चात् अपने श्रीअङ्ग पर नील वर्ण की सारी सज्जित की है। उनकी अलक-लटें गुँथी हुई हैं, ललाट पटल पर सुन्दर तिलक किया गया है और सिन्दूर से माँग भी सँवारी गयी है। [2]
श्रीराधा के मृग छौने के से सुन्दर नयन अञ्जन से युक्त कजरारे है और (उन नयनों की नोकों से आगे क्रमशः आगे बढ़ती हुई) रुचिर (कज्जल) रेखा (नेफा) अनुसारी गयी है। सखि! ललित नासिका पुट पर मणि जटित लवङ्ग (स्वर्ण पुष्प) शोभित है और दन्त पंक्ति भी (ताम्बूल, मिस्सी आदि रङ्गों से रंगी हुई गहरी ललामी से) राग रञ्जित सी दिख रही है। [3]
कँसूभी कथुकि के द्वारा कसे हुए श्रीफल जैसे उरोजों के ऊपर लहराते हुए हारों की छवि कुछ न्यारी (विलक्षण) ही है। अहा! कटि तो अत्यन्त कृश (पतली) है, उदर पर गम्भीर नाभि कुण्ड है और जघन तथा नितम्ब पुष्ट हैं-विशाल हैं । [4]
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं “वृषभानु दुलारी विविध भूषणों से भूषित अपनी कमल नाल सी कमनीय वाहु लता को श्रीश्याम सुन्दर के कन्धे (अंस) पर डाल कर ऐसे विहार कर रही हैं जैसे कोई गज गजी-करि करिणी युगल । हे सखि ! इस प्रकार श्रीवन वृन्दावन में पिय प्यारी (सदा) विहार ही करते रहते हैं।” [5]

