(राग विभास)
हरि भज हरि भज, छाँड़ि न मान नर-तन कौ। [1]
मत बंछै मत बंछै रे, तिल-तिल धन कौ॥ [2]
अनमाँग्यौं आगै आवैगौ, ज्यौं पल लागै पल कौं। [3]
कहिं श्रीहरिदास मीचु ज्यौं आवैं, त्यौं धन है आपुन कौं॥ [4]
-ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (4)
हे मनुष्य, देह के अभिमान को त्याग कर, श्री युगल किशोर प्रिया लाल का भजन कर, सच्चा भजन कर। [1]
अरे साधक, तिल-तिल (अत्यधिक) धन की लालसा मत कर, यह व्यर्थ है। [2]
यदि भगवत्प्राप्ति को अपना लक्ष्य बना लिया है, तो ठहर मत। जब श्री हरि की कृपा हो जाती है, तब सभी वस्तुएं बिना मांगे और बिना प्रयास के स्वतः प्राप्त होती हैं। जैसे दो पलकों का स्वाभाविक मिलन होता है, वैसे ही अनिच्छा करने पर भी भगवत्कृपा से सब कुछ सहज ही प्राप्त हो जाता है। [3]
श्री हरिदास जी महाराज कहते हैं, “मृत्यु के पश्चात जो धन प्राप्त होता है, अर्थात वह धन जिसे मृत्यु भी छीन नहीं सकती, वही प्रिया-प्रियतम का वास्तविक प्रेम धन है। संसार का धन तो क्षणभंगुर है, जो एक पल में नष्ट हो जाता है।” [4]
हरि भज हरि भज, छाँड़ि न मान नर-तन कौ। [1]
मत बंछै मत बंछै रे, तिल-तिल धन कौ॥ [2]
अनमाँग्यौं आगै आवैगौ, ज्यौं पल लागै पल कौं। [3]
कहिं श्रीहरिदास मीचु ज्यौं आवैं, त्यौं धन है आपुन कौं॥ [4]
-ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (4)
हे मनुष्य, देह के अभिमान को त्याग कर, श्री युगल किशोर प्रिया लाल का भजन कर, सच्चा भजन कर। [1]
अरे साधक, तिल-तिल (अत्यधिक) धन की लालसा मत कर, यह व्यर्थ है। [2]
यदि भगवत्प्राप्ति को अपना लक्ष्य बना लिया है, तो ठहर मत। जब श्री हरि की कृपा हो जाती है, तब सभी वस्तुएं बिना मांगे और बिना प्रयास के स्वतः प्राप्त होती हैं। जैसे दो पलकों का स्वाभाविक मिलन होता है, वैसे ही अनिच्छा करने पर भी भगवत्कृपा से सब कुछ सहज ही प्राप्त हो जाता है। [3]
श्री हरिदास जी महाराज कहते हैं, “मृत्यु के पश्चात जो धन प्राप्त होता है, अर्थात वह धन जिसे मृत्यु भी छीन नहीं सकती, वही प्रिया-प्रियतम का वास्तविक प्रेम धन है। संसार का धन तो क्षणभंगुर है, जो एक पल में नष्ट हो जाता है।” [4]

