हित सौं त्रिविध समीर बहै - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृदावन शत लीला (18)

हित सौं त्रिविध समीर बहै - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृदावन शत लीला (18)

हित सौं त्रिविध समीर बहै, जैसी रुचि जिहिं काल।
मधुर-मधुर कल कोकिला, कूजत मोर मराल॥

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृदावन शत लीला (18)

जिस समय श्री प्रिया प्रियतम की जैसी रुचि होती है वैसी ही शीतल मंद सुगंधित पवन श्री वृंदावन में बहती है। कहीं मधुर स्वर में कोयल कूजती है तो कहीं मोर मराल आदि मधुर स्वर करते है।