न जानीते लोकं न च निगमजातं कुल-परं-
परां वा नो जानत्यहह न सतां चापि चरितम्।
रसं राधायामाभजति किल भावं व्रजमणौ,
रहस्ये तद्यस्य स्थितिरपि न साधारण गति:।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (146)
जो महानुभाव इस एकान्त देश में ब्रज-मणि श्रीकृष्ण और श्रीराधा के भाव और रस का निश्चय रूप से भजन करते हैं। अहो ! वे न तो लोक को जानना चाहते है, न निगम समूह को, न कुल परम्परा को जानने की इच्छा रखते हैं और न साधु-आचरण को ही । ऐसे रसिकों की स्थिति साधारण नहीं वरन् असाधारण है।
परां वा नो जानत्यहह न सतां चापि चरितम्।
रसं राधायामाभजति किल भावं व्रजमणौ,
रहस्ये तद्यस्य स्थितिरपि न साधारण गति:।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (146)
जो महानुभाव इस एकान्त देश में ब्रज-मणि श्रीकृष्ण और श्रीराधा के भाव और रस का निश्चय रूप से भजन करते हैं। अहो ! वे न तो लोक को जानना चाहते है, न निगम समूह को, न कुल परम्परा को जानने की इच्छा रखते हैं और न साधु-आचरण को ही । ऐसे रसिकों की स्थिति साधारण नहीं वरन् असाधारण है।

