(राग टोडी)
सब सुख सदन बदन तुव राधे।
उपमा कमल ससी नहिं पावत, मीत मान अपराधे ।।
मृदु मुसक्यानि हरत मन नैनन, बंक बिलोकन ही दृग आधे।
लेत बलाय दुहुँ कर भगवत रसिक सिरोमनि गुननि अगाधे ।।
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (4.4)
भावार्थ - हे श्यामा प्यारी ! तुम्हारा यह मुखारविंद सब सुखों का घर है- कमल और चंद्रमा इसकी बराबरी नहीं कर सकते। वे तो अपने को अपराधी मानकर सदा डरते रहते है (कि कहीं ऐसा न मान लिया जाय कि वे तुम्हारे मुख सौंदर्य से होड कर रहे हैं, और इसी डर के कारण चंद्रमा आकाश में भाग गया है तथा कमल जल में) तुम्हारी मधुर मुसकान मुस्कान और तिरछी चितवन मेरे मन को हरती रहती हैं। भगवत रसिक जी कहते हैं कि इस प्रकार प्रशंसा करते हुए रसिक शिरोमणि श्री लाल जी, अनंत गुणों से विभूषित श्री किशोरी जी की दोनों हाथों से बलाएँ लेते रहते हैं।।४।।
सब सुख सदन बदन तुव राधे।
उपमा कमल ससी नहिं पावत, मीत मान अपराधे ।।
मृदु मुसक्यानि हरत मन नैनन, बंक बिलोकन ही दृग आधे।
लेत बलाय दुहुँ कर भगवत रसिक सिरोमनि गुननि अगाधे ।।
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (4.4)
भावार्थ - हे श्यामा प्यारी ! तुम्हारा यह मुखारविंद सब सुखों का घर है- कमल और चंद्रमा इसकी बराबरी नहीं कर सकते। वे तो अपने को अपराधी मानकर सदा डरते रहते है (कि कहीं ऐसा न मान लिया जाय कि वे तुम्हारे मुख सौंदर्य से होड कर रहे हैं, और इसी डर के कारण चंद्रमा आकाश में भाग गया है तथा कमल जल में) तुम्हारी मधुर मुसकान मुस्कान और तिरछी चितवन मेरे मन को हरती रहती हैं। भगवत रसिक जी कहते हैं कि इस प्रकार प्रशंसा करते हुए रसिक शिरोमणि श्री लाल जी, अनंत गुणों से विभूषित श्री किशोरी जी की दोनों हाथों से बलाएँ लेते रहते हैं।।४।।
- श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी (04)

