शोच्यशोच्यातिशोच्योऽहं महामूढातिमूढ़घीः ।
हठात् सर्व परित्यज्य यन्न वन्दावनं श्रये ।।
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.28)
महासोचनीय से भी अति महासोचनीय मैं हूँ। महामूर्ख से भी अति महामूर्ख बुद्धि मैं हूँ। क्योंकि जो शीघ्र ही सब कुछ त्याग कर श्रीवृन्दावन का आश्रय नहीं करता।।28।।
हठात् सर्व परित्यज्य यन्न वन्दावनं श्रये ।।
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.28)
महासोचनीय से भी अति महासोचनीय मैं हूँ। महामूर्ख से भी अति महामूर्ख बुद्धि मैं हूँ। क्योंकि जो शीघ्र ही सब कुछ त्याग कर श्रीवृन्दावन का आश्रय नहीं करता।।28।।

