नवल रँगीले दोऊ रस में रसीले अति - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (12)

नवल रँगीले दोऊ रस में रसीले अति - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (12)

(कवित्त)
नवल रँगीले दोऊ रस में रसीले अति,
सहज सुरंग नये नेह अनुरागे हैं। [1]
देखि-देखि प्यारी अनदेखी सी लगत मन,
निमिषौ न लागे नैन रैन सब जागे हैं॥ [2]
चाह भूली चाहि-चाहि यद्यपि लड़ैती पाहि,
ऐसै प्रेम रंग रस मोद मद पागे हैं। [3]
तेहि सुख की निकाई 'ध्रुव' पै कही न जाई,
तृपितौ न आई उर उरजनि लागे हैं॥ [4]

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (12)

नवल रँगीले युगल, जो सदा रस में रँगे रहते हैं, आज प्रेम के सहज एवं नूतन रंग में अनुरक्त हैं। [1]

प्रिया-मुखारविन्द की नित्य नूतन छवि-प्रभा का सतत दर्शन करते रहने पर भी प्रियतम को प्रिया नित्य अनदेखी सी लगती हैं। उनके अतृप्त नेत्रों की पलकें एक निमेष भी नहीं जुड़तीं। वे समस्त रात्री अपलक नेत्रों से प्रिया की सौन्दर्य-छवि को निहारते रहते हैं। [2]

श्री प्रिया, यद्यपि प्रियतम की समस्त कामनाओं का सतत एवं अतिशय पोषण करती हैं, तथापि प्रियतम प्रेम के आनंदरस और आमोद के मद में ऐसे पागल रहते हैं कि उनकी लालसा को देखकर मूर्तिमान लालसा भी चकित और आत्म-विस्मृत हो जाती है। [3]

युगल के इस सुखरंग की उत्कृष्टता का वर्णन मेरे जैसे ध्रुवदास के लिए अशक्य है। आश्चर्य है कि ये युगल प्रेमी, हृदय से हृदय मिलाए हुए भी, सदैव अतृप्त बने रहते हैं। [4]