मोहि कृपा करि दीजिये - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सुरत सुख (२९)

मोहि कृपा करि दीजिये - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सुरत सुख (२९)

।। दोहा ।।
या अनन्य-ब्रत-पोत के, हौ तुम खेवनहारि ।
मोहिं कृपा करि देहु अँग, सँग सेवा सुकुँवारि ॥

।। पद ।।
मोहि कृपा करि दीजिये अंग संग की सेवा।
अहो बिहारिनि लाडिली मेरें तुम देवा ।।
या अनन्य-ब्रत पोत के हौ तुमही खेवा ।
श्रीहरिप्रिया जू सौं सौंह दै पुछौ किनि भेवा ।।

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सुरत सुख (२९)

(दोहा) 
श्रीलालजू श्रीराधारानी से कहते हैं, मेरी एकमात्र आपके अंग-संग सेवा करने की ही अभिलाषा है, अतः आप कृपा करके यह सेवा मुझे प्रदान करें। सेवा-सम्बन्धी मेरे इस अनन्य व्रत को आप ही पूर्ण कर सकती हैं। मेरे इस सेवा-सम्बन्धी अनन्य व्रत-रूपी जहाज के तुमही पार लगाने वाले मल्लाह हो।

(पद) 
हे बिहारिणी लाड़ली! मेरी एकमात्र तुम ही उपास्य देव हो। कृपा करके अपने अंग-संग की सेवा प्रदान करें। मेरे इस सेवा-सम्बन्धी अनन्य व्रत-रूपी जहाज के तुमही पार लगाने वाले मल्लाह हो। श्रीहरि-प्रियाजू सखी से सौगन्ध दिलवाकर इसका अभिप्राय क्यों नहीं पूछती हो?