हा हा! वृन्दावनं त्यक्त्वा - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.31)

हा हा! वृन्दावनं त्यक्त्वा - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.31)

हा हा! वृन्दावनं त्यक्त्वा यदन्यत् कर्त्तुमुत्सहे।
जान्नपि विषं भुंजे थुत्कृत्य परमामृतम्।।

- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.31)

हाय! श्रीवृन्दावन त्यागकर जो और कार्यों में मेरा उत्साह होता है तो जानबूझ कर परमामृत को थुत्कार कर विष का ही भोजन करना चाहता हूँ।