(राग आसावरी)
हित तौ कीजै कमलनैन सौं, जा हित के आगैं और हित लागै फ़ीकौ।
हित तौ कीजै कमलनैन सौं, जा हित के आगैं और हित लागै फ़ीकौ।
कै हित कीजै साधु-संगति सौं, ज्यौं कलमष जाय सब जी कौ॥ [1]
हरि कौ हित ऐसौ, जैसौ रंग मजीठ, संसार हित रंग कसूँभ दिन दुती कौ।
कहिं श्रीहरिदास हित कीजै श्रीबिहारीजू सौं, और निबाहु जानि जी कौ॥ [2]
हरि कौ हित ऐसौ, जैसौ रंग मजीठ, संसार हित रंग कसूँभ दिन दुती कौ।
कहिं श्रीहरिदास हित कीजै श्रीबिहारीजू सौं, और निबाहु जानि जी कौ॥ [2]
- ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (07)
कमल के समान सुंदर नेत्रों वाले श्री बिहारीजी से ही प्रेम करना चाहिए, क्योंकि उनके आगे सांसारिक सुख और मोक्ष की कामनाएँ भी तुच्छ लगती हैं। अथवा उन्हीं के साक्षात् विग्रह-स्वरूप, निष्काम साधु-संतों का सत्संग करना चाहिए, क्योंकि उनके सान्निध्य मात्र से हृदय के समस्त कल्मष और अशुभ वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं। [1]
श्रीबिहारीजी अकारण-करुणा के महासागर हैं; उनके प्रेम के आगे अन्यत्र सब कुछ ही व्यर्थ है। उनका प्रेम मजीठ-रंग की तरह पक्का और अडिग है, जबकि संसार का प्रेम कुसुम के रंग जैसा है, जो एक दिन में चढ़ता और दूसरे दिन उतर जाता है, यानी क्षणिक होता है। स्वामी श्रीहरिदासजी कहते हैं, ‘यदि सच्चा प्रेम करना है, तो केवल बिहारीजी से करो, क्योंकि वही हैं जो प्रेम को निभाना जानते हैं’। [2]
श्रीबिहारीजी अकारण-करुणा के महासागर हैं; उनके प्रेम के आगे अन्यत्र सब कुछ ही व्यर्थ है। उनका प्रेम मजीठ-रंग की तरह पक्का और अडिग है, जबकि संसार का प्रेम कुसुम के रंग जैसा है, जो एक दिन में चढ़ता और दूसरे दिन उतर जाता है, यानी क्षणिक होता है। स्वामी श्रीहरिदासजी कहते हैं, ‘यदि सच्चा प्रेम करना है, तो केवल बिहारीजी से करो, क्योंकि वही हैं जो प्रेम को निभाना जानते हैं’। [2]

