मोहिं ब्रजबासिन सों बनि आई - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की बानी, सिद्धान्त के पद (144)

मोहिं ब्रजबासिन सों बनि आई - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की बानी, सिद्धान्त के पद (144)

मोहिं ब्रजबासिन सों बनि आई ।
जिनके तन मन बसत निरन्तर स्यामा स्याम सहाई ॥ [1]
निसिबासर निरखत नैननि सुख विसद बिहार सदाई ।
वारों मुक्ति पदारथ चारों चतुर्दस लोक बडाई ॥ [2]
जिनकी चरन रेनु जाँचत ऊधो ब्रह्मा हूँ न पाई।
तिनकों सर्वसु दियो अपनपौ जानि सिरोमनि राई ॥ [3]
आसन असन बसन संभासन दरस परस सुखदाई ।
श्री बिहारी दास बड़भागी अति अनुरागी की बलि जाई ॥ [4]

-श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की बानी, सिद्धान्त के पद (144)

श्री बिहारिन देव जी कहते हैं, कि ब्रजबासिन से हमारा प्रेम पुराना है, जिनके तन, मन में निरंतर एकमात्र श्री बिहारी-बिहारिनीजू ही बसे हुए हैं। [1]

नका ही आसरा है, तथा जिन की कृपा से अद्भुत नित्य विहार का अवलोकन किया है। ऐसे ब्रजबासिन पर ही चारों प्रकार की मुक्ति एवं चार पदार्थ लोकों को ठुकरा दिया जा सकता है। [2]

जिनके ही श्रीचरनकमलन की रज को साक्षात श्री ब्रह्मा, उद्धव आदि महत्पुरुष सतत वांछा करते हैं । श्री युगल ने ऐसे ब्रजवासियों को अपना सर्वस्व दिया है उनको निज जन जान कर । [3]

सर्वशिरोमणि साक्षात श्री युगल सरकार ने अपने निज जन श्री ब्रजवासी जन का अंग संग आसन बसन संभाषन दरस-परस आदि देकर हम पर अनंत कृपा करी है। श्री बिहारी दास जी, बड़भागी अति अनुरागी श्री बृजवासीजन पर बाल बार-बार बलिहारी जाते हैं । [4]