जहाँ जुगल मंगलमयी - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक

जहाँ जुगल मंगलमयी - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक

जहाँ जुगल मंगलमयी, करत निरंतर बास।
सेऊँ सो सुख रूप श्री, वृंदा विपिन विलास॥

- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (10)

मैं नित्य उसी सुख-स्वरूप धाम—श्री वृन्दावन धाम—का ही सेवन करना चाहता हूँ, जहाँ मंगलमयी युगल-रूप श्री राधा–कृष्ण सदा नित्य वास करते हैं।