न देवैर्ब्रह्माद्यैर्न खलु हरिभक्तैर्न सुहृदा-
दिभिर्यद्वै राधा - मधुपति - रहस्यं सुविदितम् ।
तयोर्दासीभूत्वा तदुपचित केली-रस-मये,
दुरन्ता: प्रत्याशा हर-हर दृशोर्गोचरयितुम् ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (१४८)
श्रीराधा-मधुसूदन का रहस्य न तो ब्रह्मादि देवताओं को ही विदित है न हरि-भक्तों को ही। और तो और श्यामसुन्दर के सखा आदिकों को भी वह सुविदित नहीं है किन्तु हरि ! हरि !! मैंने उनकों दासी होकर [ युगल की ] सम्बर्द्धमान् केलि को असमय में भी अपने नेत्रों से देखने की दुर्गम आशा कर रखी है ।
दिभिर्यद्वै राधा - मधुपति - रहस्यं सुविदितम् ।
तयोर्दासीभूत्वा तदुपचित केली-रस-मये,
दुरन्ता: प्रत्याशा हर-हर दृशोर्गोचरयितुम् ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (१४८)
श्रीराधा-मधुसूदन का रहस्य न तो ब्रह्मादि देवताओं को ही विदित है न हरि-भक्तों को ही। और तो और श्यामसुन्दर के सखा आदिकों को भी वह सुविदित नहीं है किन्तु हरि ! हरि !! मैंने उनकों दासी होकर [ युगल की ] सम्बर्द्धमान् केलि को असमय में भी अपने नेत्रों से देखने की दुर्गम आशा कर रखी है ।

