(राग टोड़ी)
तुब मुख नैन कमल अली मेरे।
पलक न लगत पलक बिनु देखै, अरबरात अति, फिरत न फेरे।।
पान करत मकरंद रूप रस, भूल नहीं फिर इत उत हेरे।
भगवत रसिक भये मतवारे, घूमत रहत छके मद तेरे।।
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (4.5)
भावार्थ - (इस पद में भगवतरसिक जी ने प्रियतमा के प्रति प्रियतम के हृदय की आसक्ति को अभिव्यक्ति दी है। प्रियतम प्रियाजी से कह रहे हैं -)
हे प्यारी, मेरे नयन तो हमेशा तुम्हारे मुख कमल के भ्रमर बने एक पल के लिये भी यदि इन्हें तुम्हारे मुखारविंद के दर्शनों से वंचित रहना पडे तो ये बेचैन हो उठते हैं, अत्यंत अधीर हो जाते है, मैं इन्हें हटाना चाहूँ तो भी नहीं हटते। ये निरंतर तुम्हारे रूप रस मकरंद का पान करते रहते हैं और भूलकर भी कभी इधर उधर नहीं देखते ।
तुम्हारे रूप सौंदर्य के मद से छककर उन्मत्त बने हुए ये (नयन) तम्हारे ही इर्द गिर्द घूमते रहते हैं ।
तुब मुख नैन कमल अली मेरे।
पलक न लगत पलक बिनु देखै, अरबरात अति, फिरत न फेरे।।
पान करत मकरंद रूप रस, भूल नहीं फिर इत उत हेरे।
भगवत रसिक भये मतवारे, घूमत रहत छके मद तेरे।।
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (4.5)
भावार्थ - (इस पद में भगवतरसिक जी ने प्रियतमा के प्रति प्रियतम के हृदय की आसक्ति को अभिव्यक्ति दी है। प्रियतम प्रियाजी से कह रहे हैं -)
हे प्यारी, मेरे नयन तो हमेशा तुम्हारे मुख कमल के भ्रमर बने एक पल के लिये भी यदि इन्हें तुम्हारे मुखारविंद के दर्शनों से वंचित रहना पडे तो ये बेचैन हो उठते हैं, अत्यंत अधीर हो जाते है, मैं इन्हें हटाना चाहूँ तो भी नहीं हटते। ये निरंतर तुम्हारे रूप रस मकरंद का पान करते रहते हैं और भूलकर भी कभी इधर उधर नहीं देखते ।
तुम्हारे रूप सौंदर्य के मद से छककर उन्मत्त बने हुए ये (नयन) तम्हारे ही इर्द गिर्द घूमते रहते हैं ।

