सुभग सुन्दरी सहज सिंगार ।।
सहज शोभा सर्वांग प्रति सहज रुप वृषभानुनन्दिनी ।
सहजानन्द कदम्बिनी सहज विपिनवर उदित चंदिनी ।।
सहज केलि नित नित नवल, सहज रंग सुख चैन ।
सहज माधुरी अंग प्रति , सु मोपै कहत बनै न ।।
- श्री सेवक जी (दामोदर दास) - श्री सेवक वाणी (7.6)
परम सुंदरों में भी सुंदर, स्वाभाविक श्रृंगार, स्वाभाविक शोभा एवं सर्वांग प्रति सहज रूप लावण्यमयी श्रीवृषभान नंदिनी हैं । आप सहज (स्वाभाविक) आनन्द की समूह एवं विपिनराज श्रीवृन्दावन में नित्य उदित स्वाभाविक चन्द्रिका हैं- अनन्त ज्योति हैं । आपकी केलि (क्रीड़ा विलासादि) सहज स्वाभाविक, नित्य नित्य नवीन, सहजानंद समूहमयी, सहज सुखमयी और सहज शान्तिमयी है । आपके अङ्ग-अङ्गो में सहज माधुर्य है, जो मुझसे कहते नहीं बनता अर्थात अनिर्वचनीय है ।
सहज शोभा सर्वांग प्रति सहज रुप वृषभानुनन्दिनी ।
सहजानन्द कदम्बिनी सहज विपिनवर उदित चंदिनी ।।
सहज केलि नित नित नवल, सहज रंग सुख चैन ।
सहज माधुरी अंग प्रति , सु मोपै कहत बनै न ।।
- श्री सेवक जी (दामोदर दास) - श्री सेवक वाणी (7.6)
परम सुंदरों में भी सुंदर, स्वाभाविक श्रृंगार, स्वाभाविक शोभा एवं सर्वांग प्रति सहज रूप लावण्यमयी श्रीवृषभान नंदिनी हैं । आप सहज (स्वाभाविक) आनन्द की समूह एवं विपिनराज श्रीवृन्दावन में नित्य उदित स्वाभाविक चन्द्रिका हैं- अनन्त ज्योति हैं । आपकी केलि (क्रीड़ा विलासादि) सहज स्वाभाविक, नित्य नित्य नवीन, सहजानंद समूहमयी, सहज सुखमयी और सहज शान्तिमयी है । आपके अङ्ग-अङ्गो में सहज माधुर्य है, जो मुझसे कहते नहीं बनता अर्थात अनिर्वचनीय है ।

