(राग मलहार)
दोऊ जन भीजत अटके बातन ।
नव निकुंज के द्वारे ठाड़े अम्बर लपटे गातन ॥ [1]
ललिता ललित रूप रस भींजी बूँद बचावत पातन ।
(श्री) 'हित हरिवंश' परस्पर प्रीतम मिलवति रति रस घातन ॥ [2]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, स्फुट वाणी (23)
भूमिका :-
वर्षा विहार का वर्णन करने वाले इस पद में श्रीहिताचार्य ने श्रीश्यामा श्याम की परस्पर निरतिशय आसक्ति का प्रदर्शन बड़े सुंदर ढंग से किया है। साथ ही इन दोनों के प्रति सखियों का अनुपम अनुराग एवं चातुर्य भी इसमें भली भाँति प्रदर्शित हुआ है।
व्याख्या :-
दोनों श्रीश्यामाश्याम भीगते हुये बातों में अटक रहे हैं ।
वे सघन कुंज के द्वार पर खड़े हैं और उनके श्रीअंगों से भीगे हुए वस्त्र लिपट रहे हैं । [1]
दोनों के रूप-रस में भीगी हुई ललिता जी उनके ऊपर पत्तों की छाया करके उनको वर्षा की बूंदों से बचा रही हैं।
श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि एक दूसरे के प्रियतम श्रीश्यामाश्याम परस्पर श्रृंगार केली के दाव पेच लगा रहे हैं । [2]
दोऊ जन भीजत अटके बातन ।
नव निकुंज के द्वारे ठाड़े अम्बर लपटे गातन ॥ [1]
ललिता ललित रूप रस भींजी बूँद बचावत पातन ।
(श्री) 'हित हरिवंश' परस्पर प्रीतम मिलवति रति रस घातन ॥ [2]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, स्फुट वाणी (23)
भूमिका :-
वर्षा विहार का वर्णन करने वाले इस पद में श्रीहिताचार्य ने श्रीश्यामा श्याम की परस्पर निरतिशय आसक्ति का प्रदर्शन बड़े सुंदर ढंग से किया है। साथ ही इन दोनों के प्रति सखियों का अनुपम अनुराग एवं चातुर्य भी इसमें भली भाँति प्रदर्शित हुआ है।
व्याख्या :-
दोनों श्रीश्यामाश्याम भीगते हुये बातों में अटक रहे हैं ।
वे सघन कुंज के द्वार पर खड़े हैं और उनके श्रीअंगों से भीगे हुए वस्त्र लिपट रहे हैं । [1]
दोनों के रूप-रस में भीगी हुई ललिता जी उनके ऊपर पत्तों की छाया करके उनको वर्षा की बूंदों से बचा रही हैं।
श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि एक दूसरे के प्रियतम श्रीश्यामाश्याम परस्पर श्रृंगार केली के दाव पेच लगा रहे हैं । [2]

