हौं बलि बलि आनन्दनिधे अब - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सुरत सुख (17)

हौं बलि बलि आनन्दनिधे अब - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सुरत सुख (17)

(दोहा)
तुव पद प्रापति लालसा, लगी रहत उर मोर ।
अहो आनंद-निधि स्वामिनी, हौं बलिहारी तोर॥

(पद)
हौं बलि बलि आनन्दनिधे अब ।
तुव पद प्रापति की रहै लालस बाल कहौ यह कौंन विधे अब ।।
जानि परी जिय में न कछू यह बानि सदा सुखदानि रिधे अब ।
श्रीहरिप्रिया अहो स्वामिनि तो बिन नाहिंन सूझत सर्बसिधे अब ।।

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सुरत सुख (17)

(दोहा)
हे आनन्द की निधि श्रीस्वामिनीजी! मैं आप पर बलिहारी जाता हूँ। मेरे हृदय में सदैव आपके चरणारविन्दों को प्राप्त करने की ही अभिलाषा बनी रहती है।

(पद) 
हे आनन्द-निधि प्रियाजू! मैं आपकी बलैया लेता हूँ। आपके चरणारविन्द-प्राप्ति की जो अभिलाषा मेरे हृदय में लगी रहती है, उसको मैं किन शब्दों में वर्णन करूँ।
हे प्रियाजू! आपकी आदत तो सदा सुख-सम्पत्ति प्रदान करने की है। इस समय क्यों इतनी देरी हो रही है, कुछ समझ में नहीं आता है। हे सर्व-सिद्धियों को प्रदान करने वाली स्वामिनीजू! आपके अतिरिक्त मुझको और कोई ठौर नहीं सूझती है।