वृन्दावन इह कति वा न मिलन्ति विदग्ध गोपसुंदर्यः।
राधे त्वयि परमक्षि क्व चकोरश्चरति चन्द्रिका-परतः।।
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (11.111)
हे श्रीराधे! इस श्रीवृन्दावन में कितनी ही क्यों न चतुर गोपसुंदरी आकर रहे? किंतु मेरे नेत्र केवल तुम्हें ही देखेंगे। चन्द्रिका को छोड़ कर और कहीं चकोर क्या विचरण कर सकता है?।
राधे त्वयि परमक्षि क्व चकोरश्चरति चन्द्रिका-परतः।।
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (11.111)
हे श्रीराधे! इस श्रीवृन्दावन में कितनी ही क्यों न चतुर गोपसुंदरी आकर रहे? किंतु मेरे नेत्र केवल तुम्हें ही देखेंगे। चन्द्रिका को छोड़ कर और कहीं चकोर क्या विचरण कर सकता है?।

