(राग विभास)
ज्यौंही-ज्यौंही तुम राखत हौ, त्यौंही-त्यौंही रहियत हौं, हो हरि। [1]
और तौ अचरचे पाँय धरौं सो तौ कहौ, कौन के पैंड़ भरि? [2]
जद्यपि कियौ चाहौं, अपनौ मनभायौ, सो तौ क्यों करि सकौं, जो तुम राखौ पकरि। [3]
कहिं श्रीहरिदास पिंजरा के जनावर लौं, तरफराय रह्यौ उड़िबे कौं कितौऊ करि॥ [4]
- ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (01)
हे हरि! आप जैसे-जैसे मुझे रखते हैं, वैसे-वैसे ही मैं रहता हूँ। [1]
आपकी इच्छा के बिना मैं एक पग भी आगे नहीं बढ़ा सकता; फिर विशेष कर्तव्य (भगवद्-प्राप्ति) की तो बात ही कहाँ है। [2]
यद्यपि आपकी रुचि के बिना कुछ भी संभव नहीं है, फिर भी मन का वास्तविक स्वरूप इधर-उधर भटकना ही है। सार यह है कि यदि आपकी कृपा ने मुझे थाम रखा है, तो मैं इधर-उधर कैसे भटक सकता हूँ? [3]
जैसे पिंजरे में बंद पक्षी पंख फड़फड़ाकर रह जाता है, उड़ नहीं सकता; वैसे ही इस जीव की दशा है—काम, क्रोध, लोभ, मोह और ईर्ष्या इसे घेरे रहते हैं। श्री हरि की कृपा के बिना वह स्वतंत्र नहीं हो सकता। [4]
आपकी इच्छा के बिना मैं एक पग भी आगे नहीं बढ़ा सकता; फिर विशेष कर्तव्य (भगवद्-प्राप्ति) की तो बात ही कहाँ है। [2]
यद्यपि आपकी रुचि के बिना कुछ भी संभव नहीं है, फिर भी मन का वास्तविक स्वरूप इधर-उधर भटकना ही है। सार यह है कि यदि आपकी कृपा ने मुझे थाम रखा है, तो मैं इधर-उधर कैसे भटक सकता हूँ? [3]
जैसे पिंजरे में बंद पक्षी पंख फड़फड़ाकर रह जाता है, उड़ नहीं सकता; वैसे ही इस जीव की दशा है—काम, क्रोध, लोभ, मोह और ईर्ष्या इसे घेरे रहते हैं। श्री हरि की कृपा के बिना वह स्वतंत्र नहीं हो सकता। [4]

