मंगल मूरति लाडिली, मंगल मूरति लाल - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (1.3)

मंगल मूरति लाडिली, मंगल मूरति लाल - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (1.3)

मंगल मूरति लाडिली, मंगल मूरति लाल । [1]
मंगल मूरति सहचरी, मंगलमय सब काल ॥ [2]
मंगलमय सब काल, अमंगल मूल नसावन । [3]
मंगल मोद बिनोद, महल मंगल मन भावन ॥ [4]
कहैं, सुनै, अनुमोद करै, पावै बर मंगल ॥ [5]

- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (1.3)

इस रसोपासना में सबकुछ मंगलमय है,यह बताते हुए भगवत रसिक जी कहते हैं कि इस नित्यबिहार की किशोरीजी मंगल की मूर्ती है, लालजी भी मंगल की मूर्ती है और नित्य सहचरी (श्रीहरिदासजी) भी मंगल की मूर्ति है । यहाँ जिस काल की व्याप्ति है, वह भी मंगल स्वरूप ही है । (दिन, रात, संध्या, प्रभात, क्षण, पल, युग, कल्प आदि के रूप में जिस काल का उल्लेख वाणियों में हुआ है, वह उस काल खंड का वाचक न होकर उस समय के लीला सुख या लीला रस का बोधक है ।) यह मंगल स्वरूप काल समस्त अमंगलों को जड़ मूल से नष्ट करने वाला है ।
इस नित्यबिहार के आनंद विनोद मंगल स्वरूप है, मनोहर महल भी मंगल स्वरूप है और रसिकन भी मंगल स्वरूप है । इन सब मंगलस्वरूप का सुयश सर्वोपरि मंगल है । जो लोग इन परम मंगलों को कहते हैं, अथवा सुनते हैं, अथवा इनका अनुमोदन करते हैं, वे चरम मंगल की प्राप्ति कर लेते हैं ।