बलि जाउँ लाड़ली लाल की ।
गरबाहीं दीने दोउ विहरत, कुंज – लतान तमाल की ॥
कीरति – कुँवरि गौर तनु इत, उत, श्यामल यशुमति – बाल की ।
छवि सोरह सिंगार इतै उत, नट – वपु वेष रसाल की ॥
प्रेम दिवाने, मनमाने दोउ, लजवत चाल मराल की ।
यदपि ‘कृपालु’ एक दोउ स्वामिनि, स्वामिनि तदपि गुपाल की ॥
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, युगल माधुरी (09)
मैं राधा – कृष्ण पर बार – बार बलि - बलि जाता हूँ | राधाकृष्ण परस्पर गले में हाथ डाले हुए तमाल लता की कुंजों में विहार कर रहे हैं, इधर तो कीर्ति – कुमारी गौरांगी राधा हैं एवं उधर यशोदा – कुमार श्यामलांग श्रीकृष्ण हैं | इधर किशोरी जी सोलहों श्रृंगार से युक्त हैं एवं उधर श्यामसुन्दर सुन्दर नटवर वेष बनाये हैं, मैं इनकी बलैयाँ लेता हूँ | प्रेम विभोर, स्वेच्छाधीन, दोनों हंस की भी चाल को लज्जित कर रहे हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि यद्यपि ये दोनों परस्पर अभिन्न हैं, फिर भी रसिकों के दृष्टिकोण से किशोरी जी श्यामसुन्दर की स्वामिनी हैं |
गरबाहीं दीने दोउ विहरत, कुंज – लतान तमाल की ॥
कीरति – कुँवरि गौर तनु इत, उत, श्यामल यशुमति – बाल की ।
छवि सोरह सिंगार इतै उत, नट – वपु वेष रसाल की ॥
प्रेम दिवाने, मनमाने दोउ, लजवत चाल मराल की ।
यदपि ‘कृपालु’ एक दोउ स्वामिनि, स्वामिनि तदपि गुपाल की ॥
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, युगल माधुरी (09)
मैं राधा – कृष्ण पर बार – बार बलि - बलि जाता हूँ | राधाकृष्ण परस्पर गले में हाथ डाले हुए तमाल लता की कुंजों में विहार कर रहे हैं, इधर तो कीर्ति – कुमारी गौरांगी राधा हैं एवं उधर यशोदा – कुमार श्यामलांग श्रीकृष्ण हैं | इधर किशोरी जी सोलहों श्रृंगार से युक्त हैं एवं उधर श्यामसुन्दर सुन्दर नटवर वेष बनाये हैं, मैं इनकी बलैयाँ लेता हूँ | प्रेम विभोर, स्वेच्छाधीन, दोनों हंस की भी चाल को लज्जित कर रहे हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि यद्यपि ये दोनों परस्पर अभिन्न हैं, फिर भी रसिकों के दृष्टिकोण से किशोरी जी श्यामसुन्दर की स्वामिनी हैं |

