यद्गोविन्द-कथा-सुधा-रस-हृदे चेतो मया जृम्भितम्,
यद्वा तद्गुण कीर्त्तनार्चन विभूषाद्यैर्दिनं प्रापितम् ।
यद्यत्प्रीतिरकारि तत्प्रिय-जनेष्वात्यन्तिकी तेन मे,
गोपेन्द्रात्मज जीवन-प्रणयिनी श्रीराधिका तुष्यतु ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (114)
जो कुछ भी मैंने गोविन्द के कथा-सुधा-रस-सरोवर में अपने चित्त को डुबाया है अथवा उनके गुण-कीर्त्तन, चरणार्चन, विभूषणादि-विभूषित करने में दिन लगाये हैं किंवा उनके प्रिय-जनों के प्रति जिस-जिस अत्यंतिकी प्रीति का विधान किया है [या मेरे द्वारा हुआ है,] उस सबके द्वारा (फल स्वरूप) गोपेन्द्र-नंदन श्रीकृष्ण की प्राण जीवन श्रीराधिका मुझ पर प्रसन्न हों।
यद्वा तद्गुण कीर्त्तनार्चन विभूषाद्यैर्दिनं प्रापितम् ।
यद्यत्प्रीतिरकारि तत्प्रिय-जनेष्वात्यन्तिकी तेन मे,
गोपेन्द्रात्मज जीवन-प्रणयिनी श्रीराधिका तुष्यतु ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (114)
जो कुछ भी मैंने गोविन्द के कथा-सुधा-रस-सरोवर में अपने चित्त को डुबाया है अथवा उनके गुण-कीर्त्तन, चरणार्चन, विभूषणादि-विभूषित करने में दिन लगाये हैं किंवा उनके प्रिय-जनों के प्रति जिस-जिस अत्यंतिकी प्रीति का विधान किया है [या मेरे द्वारा हुआ है,] उस सबके द्वारा (फल स्वरूप) गोपेन्द्र-नंदन श्रीकृष्ण की प्राण जीवन श्रीराधिका मुझ पर प्रसन्न हों।

