नहीं तरे पाताल के - श्री भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (04)

नहीं तरे पाताल के - श्री भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (04)

नहीं तरे पाताल के, नहीं परे गोलोक।
 हृदय महाबैराट के, कियो कमल में ओक॥

 - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (04)

वह नित्य-विहार-रूपी तत्त्व न तो पाताल में है और न ही गोलोक में; अपितु वह इस विराट् ब्रह्माण्ड के हृदय-कमल—श्री वृन्दावन धाम—में अपना नित्य निवास बनाए हुए है।