बैकुंठ महा बैकुंठ तै - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (177)

बैकुंठ महा बैकुंठ तै - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (177)

बैकुंठ महा बैकुंठ तै, गोलोक परै है धाम।
ए सब सेवत बृन्दाबनहिं, जहाँ बिहरै स्यामा स्याम॥

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (177)

जहाँ श्री वृन्दावन में युगल सरकार नित्य-विहार करते हैं, वह नित्य धाम वैकुण्ठ, महा-वैकुण्ठ और गोलोक धाम आदि सभी से परे है—जिनका नित्य सेवन यह सभी धाम भी करते रहते हैं।