नवल रसिक पिय एक मन एक हीय - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (40)

नवल रसिक पिय एक मन एक हीय - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (40)

(कवित्त)
नवल रसिक पिय एक मन एक हीय,
एकै बात है सुहाती दुहुँनी के मन कौ। [1]
एक वैस एक जोर एक से भूषण पट,
एक सी छबीली छबी राजति है तन कौं॥ [2]
रूप ही के रंग भीने लोचन चकोर किन्हें,
एकै संग चाहैं ऐसैं जैसे मीन वन कौं। [3]
'हित ध्रुव' रसिक सीरोमनि जुगल बिनु,
आली को निवाहै एक रस प्रेम पन कौं॥ [4]

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला,श्रृंगार शत 2 (40)

नित्य नवीन रसिक प्रिया-प्रियतम अद्वय युगल हैं। उनके तन-मन एक हैं और दोनों की रुचियां एवं प्रियता भी सदैव एक ही रहती है। [1]

यह अभिन्न जोरी सदा सम वयस है। इनके वस्त्र आभूषण भी एक से ही रहते हैं । इनके श्री अंगों की छबीली छटा भी नित्य एक जैसी ही हैं। [2]

इन्होंने रूप-दर्शन के आनन्द में भीगे हुए अपने नेत्रों को चकोर बना रखा है। जल और मीन की भाँति ये सदा एक साथ ही रहना चाहते हैं। [3]

श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं हे सखी ! रसिक शेखर युगल के बिना इस एकरस प्रेम व्रत का कौन निर्वाह कर सकता है ? [4]