काहू की आस न त्रास करै - श्री सरस देव जु, श्री सरस देव जु की वाणी, सिद्धांत के पद (14)

काहू की आस न त्रास करै - श्री सरस देव जु, श्री सरस देव जु की वाणी, सिद्धांत के पद (14)

(सवैया)
काहू की आस न त्रास करै, पकरै अपने व्रत को निरधारो। [1]
लोग लिवास लियें मनु लाखकु, लालचि जनन काज विगारौ॥ [2]
धृग जीवन दै धर्मै धन आनत, मानत धन्य कियैं मुँह कारो। [3]
'सरस' सुसार बिहार अधार, अनन्य जनन्य को पैंडोई न्यारो॥ [4]

- श्री सरस देव जु, श्री सरस देव जु की वाणी, सिद्धांत के पद (14)

नित्य विहार के अनन्य उपासक को ना तो किसी की आशा रखनी चाहिए, ना ही किसी परिस्थिति का भय होना चाहिए। केवल अपने अनन्य व्रत का दृढ़ता से पालन करना चाहिए। [1]

विलासी लोग अपने मन को असंख्य भोगों और लालचों में उलझाए रहते हैं; वे अपने धर्म को नष्ट करते हैं और उसमें भी उन्हें लज्जा का अनुभव नहीं होता। [2]

जो लोग अनन्य धर्म को छोड़कर धनार्जन को ही जीवन का लक्ष्य बना लेते हैं, उनका मुख अंततः कलुषित हो जाता है और उनका जीवन धिक्कारने योग्य बन जाता है। [3]

श्री सरस देव जी कहते हैं—समस्त रसों का सार यही नित्य-विहार रस है। जिनके प्राण का आधार यह रस है, ऐसे अनन्य रसिक संत वास्तव में परम धन्य हैं और उनका सौभाग्य अद्भुत है। [4]