नारायण जाके हिये - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (145)

नारायण जाके हिये - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (145)

नारायण जाके हिये, उपजत प्रेम प्रधान।
प्रथम हिया ही हरत है, लोकलाज कुलकान॥

- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (145)

श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि जिसके हृदय में प्रेम की प्रधानता उत्पन्न हो जाती है, वह सबसे पहले हृदय से लोक-लाज और कुल की मर्यादा का मोह ही हर लेती है। जब भक्ति का अनन्य अनुराग हृदय में जागृत होता है, तब संसार की लोक-मर्यादाएँ और सामाजिक प्रतिष्ठा के बंधन स्वतः ही विलीन हो जाते हैं।