ऐ हरी मो सौ न बिगारन कौ - ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (05)

ऐ हरी मो सौ न बिगारन कौ - ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (05)

(राग बिलावल)
ऐ हरी मो सौ न बिगारन कौ, तो सौ न सँवारन कौ, मोहिं तोहिं परी होड़। [1]
कौन धौं जीतै, कौन धौं हारै, पर बदी न छोड़॥ [2]
तुम्हारी माया बाजी विचित्र पसारी, मोहे सुर मुनि, का के भूले कोड़। [3]
कहिं श्रीहरिदास हम जीते, हारे तुम, तऊ न तोड़॥ [4]

- ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (05)

श्री हरिदास जी महाराज कहते हैं, “एक ओर हम जीव हैं, जिन्हें अपनी बिगाड़ने की आदत लगी हुई है, और दूसरी ओर अकारण करुणा के सागर, श्री बिहारी जी हैं, जो सदैव हमारी बनाने (भलाई) में लगे रहते हैं।  ऐसा लगता है मानो बिहारीजी और हमारी एक प्रकार की होड़ चल रही है।” [1]

इस प्रतियोगिता में हार-जीत का निर्धारण कर पाना असंभव है। जीव अपने बिगाड़ने की हठ नहीं छोड़ता और न ही बिहारी जी अपनी करुणा की हठ छोड़ते हैं। इसलिए इस प्रतियोगिता में हार-जीत का कोई प्रश्न नहीं उठता, क्योंकि दोनों ही पीछे हटने वाले नहीं हैं। [2]
 
जीव कहता है, “हे हरि! आपकी माया इतनी विचित्र और प्रबल है कि बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी इसके प्रभाव में आकर मोहित हो जाते हैं। मैं तो अत्यंत तुच्छ और अधम हूँ, आपकी माया से कैसे बच सकता हूँ?” [3]
 
श्री स्वामी हरिदास जी अंत में कहते हैं, “इस प्रतियोगिता का कोई अंत नहीं है। जीव हमेशा बिगाड़ता है और श्री बिहारी जी उसे बार-बार सुधारते हैं। वे हमें सुधारना चाहते हैं, पर हमारी सुधारने की मंशा ही नहीं है। अंततः इस प्रतियोगिता में हमारी जीत होती है और आपकी करुणा हारी प्रतीत होती है।” [4]