(राग मल्हार) [वर्षा समय]
देखौ माई अबला के बल रासि।
अति गज मत्त निरंकुस मोंहन ;
निरखि बँधे लट पासि।।
अबहीं पंगु भई मन की गति;
बिनु उधम अनियास ।
तबकी कहा कहौं जब प्रिय प्रति ;
चाहति भृकुटि बिलास।।
कच संजमन व्याज भुज दरसति;
मुसकनि वदन विकास ।
हा हरिवंश अनीति रीति हित ;
कत डारति तन त्रास।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चतुरासी (53)
(श्री हित सजनी ने अपनी सखियों से कहा ) "हे माई ! देखो ! अबला ( श्रीराधा ) के बल राशि को तो देखो ! जिन श्रीराधा को देखते ही अत्यंत मतवाले एवं निरंकुश गजराज वत मोहन लाल भी उनकी केश लट के एक ( अल्प ) बंधन मे अपने आप ( बिना प्रयत्न के ही ) बंध गये ! जब अभी अभी बिना प्रयास के अकस्मात ही उनकी मनोगति पंगु हो गयी, तब उस समय की क्या बात कहूँ जब वे ( श्रीप्रियाजी ) प्रियतम की ओर भौहें नचाकर-विलास पूर्वक देखेंगी ?"
"उसी समय ( श्रीप्रियाजी ने अपनी कुंतल लट को जो कपोल पर आ पड़ी थी, सम्हालने के लिए ) केश संकेलने के बहाने से अपनी बाहुलता का दर्शन कराया, और मुस्कान पूर्वक अपने श्रीमुख को विकसित कर दिया; ( बस इतने से श्री लालजी की दशा प्रेम विव्हल हो गयी I यह सब देख श्री हित ) हरिवंश सजनी बोल उठीं-हाय ! हाय !! इस प्रीति की रीति मे भी बड़ी अनीति है ! अरी ! अब क्यों ( उन प्रेम विव्हल को ) व्यर्थ तन त्रास दे रही हो ? ( जो अपने आप घायल है उसे और भी छेड़ना क्या यही प्रेम राज्य की रीति है ?" )
देखौ माई अबला के बल रासि।
अति गज मत्त निरंकुस मोंहन ;
निरखि बँधे लट पासि।।
अबहीं पंगु भई मन की गति;
बिनु उधम अनियास ।
तबकी कहा कहौं जब प्रिय प्रति ;
चाहति भृकुटि बिलास।।
कच संजमन व्याज भुज दरसति;
मुसकनि वदन विकास ।
हा हरिवंश अनीति रीति हित ;
कत डारति तन त्रास।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चतुरासी (53)
(श्री हित सजनी ने अपनी सखियों से कहा ) "हे माई ! देखो ! अबला ( श्रीराधा ) के बल राशि को तो देखो ! जिन श्रीराधा को देखते ही अत्यंत मतवाले एवं निरंकुश गजराज वत मोहन लाल भी उनकी केश लट के एक ( अल्प ) बंधन मे अपने आप ( बिना प्रयत्न के ही ) बंध गये ! जब अभी अभी बिना प्रयास के अकस्मात ही उनकी मनोगति पंगु हो गयी, तब उस समय की क्या बात कहूँ जब वे ( श्रीप्रियाजी ) प्रियतम की ओर भौहें नचाकर-विलास पूर्वक देखेंगी ?"
"उसी समय ( श्रीप्रियाजी ने अपनी कुंतल लट को जो कपोल पर आ पड़ी थी, सम्हालने के लिए ) केश संकेलने के बहाने से अपनी बाहुलता का दर्शन कराया, और मुस्कान पूर्वक अपने श्रीमुख को विकसित कर दिया; ( बस इतने से श्री लालजी की दशा प्रेम विव्हल हो गयी I यह सब देख श्री हित ) हरिवंश सजनी बोल उठीं-हाय ! हाय !! इस प्रीति की रीति मे भी बड़ी अनीति है ! अरी ! अब क्यों ( उन प्रेम विव्हल को ) व्यर्थ तन त्रास दे रही हो ? ( जो अपने आप घायल है उसे और भी छेड़ना क्या यही प्रेम राज्य की रीति है ?" )

