यदि स्नेहाद्राधे दिशसि रति-लाम्पटय् पदवीं
गतं ते सवप्रेष्टं तदपि मम निष्ठं श्रृणु यथा।
कटाक्षैरालोके स्मित सहचरैर्जात पुलकं,
समाश्लिष्याम्युच्चैरथ च रसये त्वत्पद रसम ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (87)
हे राधे रति लाम्पट्य पदवी प्राप्त अपने प्रियतम के प्रति आप स्नेहवश मुझे सौंप देंगी तब भी मेरी निष्ठा क्या होगी, उसे सुनिए -
"मैं मंद मंद मुस्कान के साथ तिरछे नेत्रों से प्यारे की ओर देखूंगी, बस इतने मात्र से ही उनका शरीर रोमांचित हो जायेगा, फिर जब वे मुझे या मैं उन्हें गाढ़ आलिंगन करुँगी तब वे प्रेम विव्हल हो जाएंगे, एवं मैं उन्हें अपना रोमांच भी प्रदर्शित करुँगी, परन्तु इतना सब होते हुए भी मुझे केवल आपके रसमय चरणों का ही रसानुभव होगा।"
गतं ते सवप्रेष्टं तदपि मम निष्ठं श्रृणु यथा।
कटाक्षैरालोके स्मित सहचरैर्जात पुलकं,
समाश्लिष्याम्युच्चैरथ च रसये त्वत्पद रसम ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (87)
हे राधे रति लाम्पट्य पदवी प्राप्त अपने प्रियतम के प्रति आप स्नेहवश मुझे सौंप देंगी तब भी मेरी निष्ठा क्या होगी, उसे सुनिए -
"मैं मंद मंद मुस्कान के साथ तिरछे नेत्रों से प्यारे की ओर देखूंगी, बस इतने मात्र से ही उनका शरीर रोमांचित हो जायेगा, फिर जब वे मुझे या मैं उन्हें गाढ़ आलिंगन करुँगी तब वे प्रेम विव्हल हो जाएंगे, एवं मैं उन्हें अपना रोमांच भी प्रदर्शित करुँगी, परन्तु इतना सब होते हुए भी मुझे केवल आपके रसमय चरणों का ही रसानुभव होगा।"

